आम आदमी पार्टी सीटें बचाने में जुटी तो बीजेपी बढ़ाने में, वोटिंग का दिन आते-आते दोनों पार्टियों में रह सकता है कुछ ही सीटों का फर्क!

जन सरोकार ब्यूरो/आरके सेठी
नई दिल्ली, 24 जनवरी। देश के दिल दिल्ली में हो रहे चुनाव पर हरेक की नजर बारीकी से टिकी है। हर दिन सियासी संग्राम गर्मा रहा है। दस साल से दिल्ली पर राज कर अरविंद केजरीवाल जीत को लेकर कितने भी आश्वास्त दिख रहे हों, लेकिन बीजेपी के ऑफेसिंव स्टाइल से वह भी अचंभे में हैं। वहीं, दिल्ली की सत्ता से 25 साल से दूर बैठी बीजेपी की ‘तड़प’ फिर से सत्ता पाने को हर दिन बढ़ रही है। यह हालात साफ संकेत कर रहे हैं कि दिल्ली में इस बार के चुनाव इतने ज्यादा ‘टाइट’ रहने वाले हैं कि इससे पहले शायद ही कभी रहे हों।
2013 के चुनाव को अलग रख देखें तो दिल्ली ने जिस भी चुनाव में जिस भी पार्टी पर भरोसा जताया, खुल कर जताया और दबा के जिताया। दिल्ली की सत्ता पर जब 1993 में पहली बार बीजेपी काबिज हुई तो दिल्ली ने उस पर भरोसा करने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी। 70 में से 49 सीटें दे कर सरकार बनवाई। वो बात अलग कि उस वक्त सत्ता बीजेपी से संभली नहीं और पांच साल के राज में बीजेपी ने तीन-तीन सीएम बदल डाले। नतीजा यह रहा कि दिल्ली भी फिर बीजेपी को भूल गई। 1998 में हुए चुनाव में नमक और प्याज के रेटों ने बीजेपी को धूल चटा दी और कांग्रेस ने 52 सीटें जीत कर शीला दीक्षित के मुख्यमंत्री रहते शानदार पारी की शुरूआत की। तब बीजेपी सिर्फ 15 सीटों पर सिमट गई थी। इसके बाद कांग्रेस ने लगातार तीन टर्म पीछे मुड़ कर नहीं देखा। 2003 के चुनाव में कांग्रेस ने फिर से 47 सीटों के साथ स्पष्ट बहुमत हासिल किया तो बीजेपी 20 सीटों पर अटक गई। इसके बाद 2008 के चुनाव में भी दिल्ली की जनता ने कांग्रेस पर भरोसा रखा और 43 सीटें दे कर सरकार बनवाई। उस वक्त बीजेपी को 23 सीटें मिली। लेकिन, इसके बाद से कांग्रेस का ‘खराब टाइम’ ऐसा शुरू हुआ कि अब तक नहीं सुधरा। 2013 के चुनाव में अन्ना आंदोलन के बाद और कॉमनवेल्थ गेम्स में घोटालों में ‘ऊपर से नीचे’ तक लिपटी कांग्रेस का ‘हाथ’ दिल्ली की पब्लिक ने छोड़ दिया।
अन्ना आंदोलन से निकले अरविंद केजरीवाल की ‘नई-नवेली’ आम आदमी पार्टी लांच हुई और पहली बार कन्फ्यूज दिल्ली यह तय नहीं कर पाई कि केजरीवाल पर भरोसा करना है कि नहीं करना। नतीजा यह रहा कि दिल्ली में पहली बार किसी भी पार्टी को स्पष्ट बहुमत नहीं मिला। आम आदमी पार्टी को 28 सीटों, बीजेपी को 31 और कांग्रेस को 8 और अन्य को तीन सीटें मिली। खूब माथा-पच्ची के बाद आखिरकार कांग्रेस ने केजरीवाल का साथ दिया और सरकार बन गई। लेकिन, जनलोकपाल बिल के मसले पर आम आदमी पार्टी और कांग्रेस में ‘पटरी’ बैठी नहीं और सिर्फ 49 दिन बाद ही केजरीवाल ने इस्तीफा दे दिया। दिल्ली में राष्ट्रपति शासन करीब साल भर से भी ज्यादा लगा रहा। इसके बाद 2015 में हुए चुनाव में दिल्ली ने दिल खोलकर केजरीवाल का साथ दिया। 70 में से 67 सीटें आम आदमी पार्टी को मिली तो न सिर्फ देश बल्कि विदेशों में भी आप का डंका बज गया। बीजेपी को सिर्फ तीन सीटें मिली और कांग्रेस रही खाली हाथ। इसी तरह, 2020 में हुए चुनाव में भी दिल्ली के सिर पर केजरीवाल का ‘जादू’ बरकरार रहा और 62 सीटों के साथ उन्होंने फिर से सत्ता में वापिसी पर ली। इस बार बीजेपी को मिली आठ सीटें और कांग्रेस फिर रही खाली हाथ।
अब, 2025 के चुनाव में समय ऐसा है कि बीजेपी केंद्र की सत्ता में लगातार तीसरी बार काबिज है। कई राज्यों में ‘धड़ाधड़’ उसकी सरकारें बनी हैं। कुछ महीने पहले ही हुए हरियाणा के चुनाव में भी ‘छुपी रुस्तम’ साबित होने वाली बीजेपी हौंसले से लबरेज है और केजरीवाल सरकार भ्रष्टाचार के आरोपों में इतनी घिरी है कि समझ नहीं आता कि किस आरोप का क्या जवाब दे। दिल्ली की जनता पहली बार इतनी ‘चुप-चुप’ दिख रही है। इस चुप्पी में छिपे राज टटोलने की कोशिशें कोई कितनी भी कर ले, लेकिन यह लगभग तय है कि दिल्ली अबकी बार केजरीवाल सरकार से भी खुश नहीं और बीजेपी पर भी भरोसा करते डर रही है। रही बात कांग्रेस की तो बताने वाले बता रहे कि सीटें दो आएंगे या तीन! खैर, दिल्ली में हो रहे चुनाव बहुत मायनों में अलग साबित होंगे। यह कहना भी गलत नहीं होगा कि सीटें बचाने में जुटे केजरीवाल और सीटें बढ़ाने में लगी बीजेपी में वोटिंग के दिन तक कांटे की टक्कर भी पूरे देश को दिखने लगे। यह निर्भर करेगा कि किसका ‘वार’ कितना तेज और तीखा है।