बीजेपी के लिए चुनौती है दिल्ली चुनाव में 8 से 36 सीटों का सफर!

जन सरोकार ब्यूरो/आरके सेठी
नई दिल्ली, 23 जनवरी। बेशक दिल्ली को जीतना बीजेपी ने नाक का सवाल बना लिया हो, लेकिन आज की तारीख तक बीजेपी की डगर मुश्किलों भरी है। हालांकि, ऐसा भी नहीं कि आम आदमी पार्टी दिल्ली की सत्ता की दहलीज पर खड़ी है, यह कहना इसलिए वाजिब है कि पिछले दोनों चुनाव में वोटिंग से करीब दो हफ्ते पहले ही केजरीवाल के प्रति दिल्ली की दीवानगी दिखने लगती थी, जो इस बार गायब है। 2020 के चुनाव में हुई करीब 62 फीसदी वोटिंग में आम आदमी पार्टी जब 62 सीटें जीती तो 8 सीटें जीतने वाली बीजेपी के लिए यह हैरतंगेज बिलकुल नहीं था, क्योंकि उससे पहले 2015 में हुए चुनाव में वह सिर्फ तीन सीटें ही जीत पाई थी और आप के हिस्से में 67 सीटें थी। किंतु, अब 2025 के इन चुनावों में ना तो सट्टा बाजार और ना ही राजनीतिक विश्लेषण बीजेपी को पिछले चुनावों जितना कमजोर मान रहे हैं। हालांकि, इस बात में भी कोई दोराय नहीं कि दिल्ली मेंं चल रहे ‘मुफ्त’ के जादू ने आम आदमी पार्टी को बीजेपी से फिलहाल आगे रख रखा है। बीजेपी ने भले ही आम आदमी पार्टी के ‘मुफ्त’ का मुकाबला करने में कसर कोई ना छोड़ी हो, लेकिन वह है अभी भी ‘आप’ से पीछे।
दिल्ली को जीतने के रणनीति बनाते-बनाते बीजेपी को बरसों गुजर गए हैं और बीजेपी ने ऐसा कोई तरीका या हथकंडा बाकी नहीं छोड़ा, जिससे अरविंद केजरीवाल को घेरने की कोशिश ना की हो। केजरीवाल सरकार पर भ्रष्टाचार और वादाखिलाफी के बीजेपी के इल्जामों की फेहरिस्त इतनी लंबी है कि दिल्ली की पब्लिक भी बहुत बार कन्फ्यूज हो जाती है। दिल्ली के इन चुनावों में बीजेपी ऐसी कोई चूक करने से बच रही है, जिससे फायदा आम आदमी पार्टी को हो। किंतु, ‘आप’ की हर आरोप पर ‘हाजिरजवाबी’ की काट बीजेपी अभी नहीं तलाश पाई है। बीजेपी के पास एक से बढ़ कर एक धुरंधर नेता हैं, रणनीतियां हैं, वादे हैं, दावे हैं और केंद्र की सत्ता की ‘ताकत’ भी। ना जाने फिर भी क्यों बीजेपी दिल्ली की जनता में खुद के प्रति वह भरोसा कायम करने में थोड़ी पिछड़ रही है, जो उसे दिल्ली की सत्ता की कुर्सी दिला सकता है।
दिल्ली की सियासत को करीब से समझने वाले राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि दिल्ली में बीजेपी सत्ता पर अगर काबिज हुई तो यह सिर्फ इसी परिस्थिति में हो सकता है, जब आम आदमी पार्टी खुद अपने पैरो पर कुल्हाड़ी मारे, जो कि फिलहाल लग नहीं रहा। अब गौर करें कि जिस महादेव सट्टा एप पर केंद्र सरकार ने कुछ वक्त पहले ताबड़तोड़ एक्शन लिया था। उसी महादेव सट्टा एप पर आम आदमी पार्टी की सीटें स्पष्ट बहुमत से भी कहीं ज्यादा दिखाई जा रही हैं। इसी तरह, सी वोटर सर्वे में भी करीब 51 फीसदी वोट आम आदमी पार्टी के हिस्से में बताए गए हैं।
इसी बीच, एक दिलचस्प बात यह भी खुलकर सामने आ रही है कि दिल्ली चुनाव में बीजेपी जहां भी खड़ी है और जितनी भी सीटों पर आगे है, खुद को वह उससे कहीं ज्यादा आगे मान कर चल रही है। पार्टी स्तर पर वर्करों के हौंसले के लिए बेशक यह रणनीतिक तरीका हो सकता है, लेकिन देखा जा रहा है कि बीजेपी आज की तारीख में भी खुद को जीता हुआ ही मानकर चल रही है। यकीनन, यह स्थिति बीजेपी के उसे सफर को बड़ा नुक्सान पहुंचा सकती है जो उसने 8 सीटों से बढक़र 36 सीटों का तय करने की सोच रखी है। 70 विधानसभा सीटों वाली दिल्ली इस बार दस साल से राज कर रही केजरीवाल सरकार पर ही फिर से भरोसा जताती है या बीजेपी को मौका देगी, यह तो आने वाला वक्त ही बताएगा।
परंतु, आज वोटिंग से करीब 13 दिन पहले यह कहना गलत नहीं होगा कि बीजेपी के लिए अभी दिल्ली दूर है। चुनाव के आखिरी एक हफ्ते में दिल्ली चुनाव में ऐसा बहुत कुछ होने की संभावना-आशंका है, जो हालात और कयासों को बदल कर रख सकता है। बीजेपी अगर ओवर कांफिडेंट नहीं हुई तो वोटिंग का दिन आते-आते बहुत कुछ अप्रत्याशित कर गुजर सकती है। और अगर, आम आदमी पार्टी को हारा हुआ मान कर ‘बड़बोलापन’ हुआ तो यह मान कर चलिए कि आप तो पहले ही ‘मुफ्त’ की दौड़ में बीजेपी से आगे है। वोट जिन्होंने देना है, अगर बीजेपी उन्हें ‘अंहकारी’ महसूस हुई तो ‘वनवास’ पांच साल और बढ़ जाएगा।