दिल्ली चुनाव में बीजेपी और आम आदमी पार्टी के लीडरों की बयानजारी दिन-ब-दिन बदजुबानी में बदल रही है, दिल्ली सब देख रही है!

जन सरोकार ब्यूरो/आरके सेठी
नई दिल्ली, 22 जनवरी। देश पर राज करने वाली बीजेपी देश की राजधानी में राज करने को 25 साल से तरस रही है। कई राज्यों में जीत का सिलसिला चलाए रखने वाली बीजेपी इस बार दिल्ली चुनाव में खूब आक्रामक है। यानी, दिल्ली की सत्ता पाने के लिए बीजेपी इस बार बेकरार है। वहीं, दस साल से दिल्ली पर राज कर रही आम आदमी पार्टी सत्ता को अपने हाथ से जाने नहीं देना चाह रही। और, रही बात कांग्रेस की तो वह 1998 से लगातार 2013 तक रही अपनी सरकार रहने के बावजूद इन चुनावों में फिलवक्त ऐसा कुछ करती दिख नहीं रही जिससे लगे कि वह सत्ता की ख्वाहिशमंद है।
दिल्ली विधानसभा चुनाव में इस बार जो सबसे खास बात देखने को मिल रही है, वह यह कि आम वोटर चुनाव को लेकर बिलकुल भी उत्साहित नहीं दिख रहा। पॉलिटिकल पार्टियों के वर्करों के अलावा किसी की जुबान पर चुनाव का जिक्र नहीं है। पब्लिक आम आदमी पार्टी और भारतीय जनता पार्टी में चल रहे ‘मुफ्त’ के वादों के कम्पीटिशन को देख-सुन रही है। आम आदमी पार्टी पर पब्लिक को ‘मुफ्तखोर’ बनाने का इल्जाम लगाने वाली बीजेपी को भी इन चुनावों में यह समझ आ रहा है कि दिल्ली की सत्ता उसी के हाथ में रहेगी या आएगी जो जितना ज्यादा मुफ्त का वादा करेगा। दिल्ली चुनाव में तमाम दावों और वादों के बीच एक-दूसरे को नीचा दिखाने के लिए हो रही बयानबाजियां भी दिन-ब-दिन बदजुबानी में बदल रही हैं। हालात ऐसे बन रहे हैं कि बीजेपी और आम आदमी पार्टी अपने सोशल मीडिया हैंडल से एक-दूसरे को खुलकर ‘गरिया’ रही हैं। बीजेपी जहां केजरीवाल को ‘महाठग’ बात रही है, वहीं केजरीवाल भी बीजेपी को ‘गालीबाज’ कह रहे हैं। सोशल मीडिया पर दोनों ही पार्टियों की ओर से ऐसे-ऐसे पोस्टर जारी किए जा रहे हैं, जिनमें गड़बड़-घोटालों की भी बात है और लीडरों को बदतमीज और झगड़ालू करार देने का मुकाबला भी।
दिल्ली की राजनीति की नब्ज समझने वाले सियासी जानकारों का कहना है कि सत्ता से 25 साल से बाहर रहते-रहते बीजेपी इतना ‘ऊब’ गई है कि वह अब ‘खीझ’ चुकी है। सीधी बात यह कि इस बार वह किसी भी ‘कीमत’ पर सत्ता कब्जाना चाहती है। 1993 में जब पहली बार दिल्ली में हुए चुनाव में बीजेपी ने जीत हासिल की थी तो बीजेपी ने मदन लाल खुराना को पहला मुख्यमंत्री बनाया था। लेकिन, उनका नाम हवाला कांड में आने के बाद दो साल बाद ही उनसे इस्तीफा ले लिया गया और फिर साहिब सिंह वर्मा को मुख्यमंत्री बनाया गया। किंतु, वह भी पार्टी के लीडरों को भाए नहीं और दो साल बाद उन्हें भी हटा दिया गया। 1998 में चुनाव से कुछ महीने ही पहले बीजेपी ने उनकी जगह सुषमा स्वराज को चीफ मिनिस्टर बना दिया। लेकिन, तब तक देर हो चुकी थी और दिल्ली का भरोसा बीजेपी से उठ गया। 1998 में हुए चुनाव में कांग्रेस शीला दीक्षित की लीडरशिप में सत्ता में ऐसी आई कि फिर लगातर तीन बार सरकार बनाई। यानी, कांग्रेस 2013 तक सत्ता में रही और तीनों बार मुख्यमंत्री भी शीला दीक्षित ही रहीं। इसके बाद से लगातार आम आदमी पार्टी सत्ता में रही है। बहरहाल, अभी तक बीजेपी को यकीन है कि वह दिल्ली का भरोसा जीत लेगी और ‘आप’ को भी यकीन है कि दिल्ली उन्हें ‘बेदखल’ नहीं करेगी।