अरविंद केजरीवाल जब बातों और वादों को शुरू करते हैं तो वह खुद भी बहुत बार भूल जाते हैं कि आखिर उन्हें रोकना कहां है

जन सरोकार ब्यूरो/आरके सेठी
नई दिल्ली, 23 जनवरी। पहली बार 2013 में चुनाव जीत कर 28 सीटें हासिल कर कांग्रेस की मदद से 49 दिन तक सरकार चलाने वाले आम आदमी पार्टी के मुखिया अरविंद केजरीवाल 2025 के इन चुनावों का रुख बड़ी गहराई तक भांप रहे हैं। बेशक, आम आदमी पार्टी ने 2015 में 67 और 2020 में 62 सीटें जीत बड़े बहुमत से सरकार बनाई हो, लेकिन अबकी बार पार्टी के वादों पर भरोसा कम और सवाल ज्यादा हो रहे हैं।
दिल्ली की राजनीति को करीब से समझने वाले राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि अरविंद केजरीवाल जब बातों और वादों को शुरू करते हैं तो वह खुद भी बहुत बार भूल जाते हैं कि आखिर उन्हें रोकना कहां है। और यही स्थिति 2025 के इन चुनाव में उनके गले की फांस बन सकती है। शिक्षा और स्वास्थ्य के मुद्दे के अलावा केजरीवाल सरकार के पास पब्लिक को बताने के लिए ज्यादा कुछ है नहीं। जनलोकपाल बिल तो चर्चा से ही बाहर हो चला है। यमुना की गंदगी और दिल्ली की बदहाल सडक़ों को संवारने के उनके वादों का असर जहां कहीं नहीं दिखता, वहीं प्रदूषण, स्थाई रोजगार, फ्री वाईफाई, अनधिकृत कॉलोनियों के नियमतिकरण से भी काफी पीछे हैं। इतना ही नहीं, पब्लिक मानती है कि सरकार में पारदर्शिता के वादे पर भी केजरीवाल पूरी तरह से खरे नहीं उतरे हैं।